Lesson 5
अपरिमेय संख्याएँ: √2, √3 की उपपत्ति (उदाहरण 5, 6, 7)
इस पाठ में आप क्या सीखोगे
इस पाठ में हम सिद्ध करेंगे कि √2 और √3 अपरिमेय संख्याएँ हैं। "सिद्ध करना" मतलब ऐसा पक्का कारण देना, जिसे कोई काट न सके।
- किताब का अनुच्छेद 1.3: अपरिमेय संख्याओं को दोबारा याद करना।
- प्रमेय 1.2, और प्रमेय 1.3 जो कहती है कि √2 अपरिमेय है।
- उदाहरण 5, 6 और 7 के पूरे हल।
- मॉडल पेपर 2026–27 में इसी पर आए प्रश्न।
1.3 अपरिमेय संख्याओं का पुनर्भ्रमण
किताब ने इस हिस्से का नाम "पुनर्भ्रमण" रखा है। इसका सीधा मतलब है "दोबारा घूमकर देखना", यानी दोबारा याद करना। अपरिमेय संख्याएँ हम पाठ 1 में पढ़ चुके हैं। यहाँ उन्हें फिर से याद करते हैं।
याद कीजिए कि एक, संख्या 's' अपरिमेय संख्या कहलाती है, यदि उसे के रूप में नहीं लिखा जा सकता हो, जहाँ p और q पूर्णांक हैं और q ≠ 0 है।
आसान भाषा में: जिस संख्या को "पूर्णांक/पूर्णांक" वाली भिन्न की तरह नहीं लिख सकते, वह अपरिमेय है। जैसे परिमेय है, क्योंकि ऊपर 3 और नीचे 4 है। पर √2 को ऐसे कभी नहीं लिख सकते।
किताब के उदाहरण: √2, √3, √15, π, −, 0.10110111011110...
आखिरी संख्या को ध्यान से देखो। इसमें 1 के समूहों के बीच 0 आता है। हर बार समूह में एक 1 बढ़ जाता है: 1, 11, 111, 1111, ... इसलिए इसमें कोई एक टुकड़ा हमेशा नहीं दोहराता। ऐसी संख्या अपरिमेय होती है।
उल्टा मानकर सिद्ध करना (विरोधोक्ति द्वारा उपपत्ति)
इस पाठ की हर उपपत्ति एक ही तरीके से होती है। पहले यह तरीका एक रोज़ की बात से समझो।
मान लो तुम्हारा दोस्त कहता है, "आज रविवार है।" तुम उसकी बात मानकर आगे सोचते हो: रविवार है, तो स्कूल बंद होना चाहिए। पर तुम देखते हो कि स्कूल खुला है और सारी कक्षाएँ चल रही हैं। "स्कूल बंद होना चाहिए" और "स्कूल खुला है", ये दोनों बातें एक साथ सच नहीं हो सकतीं। इसलिए दोस्त की शुरुआत वाली बात ही गलत थी। आज रविवार नहीं है।
ऐसी दो बातें, जो एक-दूसरे की उलटी हों और साथ में सच न हो सकें, उन्हें विरोधाभास कहते हैं। "विरोधोक्ति द्वारा उपपत्ति" का मतलब है "उलटी बात मानकर, उसे गलत दिखाकर सिद्ध करना"।
गणित में यह तरीका ऐसे चलता है:
- जो सिद्ध करना है, उसका उल्टा मान लो। जैसे √2 को अपरिमेय सिद्ध करना है, तो मान लो कि √2 परिमेय है।
- इस मानी हुई बात को सच मानकर हिसाब आगे बढ़ाओ।
- आगे चलकर कोई ऐसी बात निकलेगी, जो शुरू में मानी गई किसी बात से उलटी होगी।
- दोनों बातें साथ में सच नहीं हो सकतीं। इसलिए शुरू में जो उल्टा माना था, वह गलत है। यानी असली बात सही है।
प्रमेय 1.2
प्रमेय 1.2: मान लीजिए p एक अभाज्य संख्या है। यदि p, a² को विभाजित करती है, तो p, a को भी विभाजित करेगी, जहाँ a एक धनात्मक पूर्णांक है।
पहले शब्द समझो:
- "p, a² को विभाजित करती है" का मतलब है कि a² में p से पूरा भाग जाता है। यानी कुछ नहीं बचता।
- "धनात्मक पूर्णांक" का मतलब है 1, 2, 3, ... जैसी संख्याएँ।
आसान भाषा में: किसी अभाज्य संख्या से a² में पूरा भाग जाए, तो a में भी पूरा भाग जाएगा।
उदाहरण: a = 6 लो। तब a² = 6 × 6 = 36 है।
- 3 × 12 = 36 है, इसलिए 36 में 3 से पूरा भाग जाता है। और 3 × 2 = 6 है, इसलिए 6 में भी।
- 2 × 18 = 36 है, इसलिए 36 में 2 से पूरा भाग जाता है। और 2 × 3 = 6 है, इसलिए 6 में भी।
p का अभाज्य होना ज़रूरी क्यों है? एक उदाहरण देखो। 4 × 9 = 36 है, इसलिए 36 में 4 से भी पूरा भाग जाता है। पर 6 में 4 से पूरा भाग नहीं जाता, 2 बच जाता है। 4 अभाज्य नहीं है, इसलिए उस पर यह प्रमेय लागू नहीं होती। यह प्रमेय सिर्फ अभाज्य संख्याओं के लिए है।
उपपत्ति (किताब में इस पर * लगा है, और लिखा है कि "यह परीक्षा की दृष्टि से नहीं है"। फिर भी समझने के लिए पढ़ो):
स्टेप 1: a को अभाज्य संख्याओं में तोड़ो। मान लो a = p₁ × p₂ × ... × pₙ है। यहाँ p₁, p₂, ... सिर्फ a के अभाज्य गुणनखंडों के नाम हैं। जैसे a = 6 हो, तो p₁ = 2 और p₂ = 3 है।
स्टेप 2: अब a² = a × a है। इसलिए a² = (p₁ × p₂ × ... × pₙ) × (p₁ × p₂ × ... × pₙ) है। यानी a² में वही अभाज्य संख्याएँ हैं जो a में हैं, बस हर एक दो बार। जैसे 36 = (2 × 3) × (2 × 3) है। इसमें सिर्फ 2 और 3 हैं, कोई नई अभाज्य संख्या नहीं।
स्टेप 3: p से a² में भाग जाता है, और p अभाज्य है। इसलिए p, a² का एक अभाज्य गुणनखंड है।
स्टेप 4: आधारभूत प्रमेय (पाठ 2) कहती है कि अभाज्य गुणनखंडन सिर्फ एक तरह का होता है। इसलिए a² के अभाज्य गुणनखंड सिर्फ p₁, p₂, ..., pₙ ही हैं। तो p इन्हीं में से कोई एक है।
स्टेप 5: p₁, p₂, ..., pₙ तो a के भी गुणनखंड हैं। इसलिए p भी a का गुणनखंड है।
अतः p से a में भी पूरा भाग जाएगा।
अब तुम करो: 100 = 10² में 5 से पूरा भाग जाता है। क्या 10 में भी 5 से भाग जाता है?
उत्तर: हाँ, 5 × 2 = 10 है। 5 अभाज्य है, इसलिए प्रमेय 1.2 यही कहती है।
प्रमेय 1.3
प्रमेय 1.3: √2 एक अपरिमेय संख्या है।
हमें क्या सिद्ध करना है? √2 को किसी भी तरह "पूर्णांक/पूर्णांक" वाली भिन्न में नहीं लिखा जा सकता।
कौन-सा तरीका लगेगा? उल्टा मानकर सिद्ध करना। बीच में प्रमेय 1.2 काम आएगी।
उपपत्ति:
स्टेप 1: उल्टा मान लेते हैं।
मान लेते हैं कि √2 एक परिमेय संख्या है। तब इसे भिन्न में लिख सकते हैं:
यहाँ a और b पूर्णांक हैं, और b ≠ 0 है। हम यह भी मानते हैं कि a और b सहअभाज्य हैं। यानी इनमें 1 के अलावा कोई साझा गुणनखंड नहीं है।
ऐसा क्यों मान सकते हैं? अगर कोई साझा गुणनखंड होता, तो हम भिन्न को काटकर छोटा कर लेते। जैसे में 2 साझा है। ऊपर-नीचे 2 से भाग दो: 6 ÷ 2 = 3 और 4 ÷ 2 = 2 है। इसलिए = बनता है। 3 और 2 में अब कुछ साझा नहीं है। इसलिए हर भिन्न को सबसे छोटे रूप में लिखा जा सकता है।
स्टेप 2: दोनों तरफ b से गुणा करते हैं, ताकि भिन्न हट जाए।
दाईं तरफ × b में ऊपर का b और नीचे का b कट जाते हैं, और a बचता है। इसलिए:
स्टेप 3: अब दोनों तरफ का वर्ग करते हैं, ताकि √ का निशान हट जाए।
बाईं तरफ (b√2)² = b√2 × b√2 है। b और b मिलकर b² बनते हैं। और √2 × √2 = 2 होता है, क्योंकि √2 वही संख्या है जिसका वर्ग 2 है। इसलिए:
इसे उल्टा लिखो: a² = 2b²
इसका मतलब है कि a², 2 का कुछ गुना है। यानी a² में 2 से पूरा भाग जाता है।
स्टेप 4: प्रमेय 1.2 लगाते हैं।
प्रमेय 1.2 कहती है: किसी अभाज्य संख्या से किसी पूर्णांक के वर्ग में पूरा भाग जाए, तो उस पूर्णांक में भी पूरा भाग जाता है। 2 अभाज्य है, और 2 से a² में पूरा भाग जाता है। इसलिए 2 से a में भी पूरा भाग जाएगा।
a में 2 से पूरा भाग जाता है, तो a किसी पूर्णांक का दोगुना है। उस पूर्णांक का नाम c रखो:
जैसे a = 10 हो, तो 10 = 2 × 5 है, यानी c = 5 होता।
स्टेप 5: अब a = 2c को पिछले समीकरण में रखते हैं।
हमारे पास था:
a की जगह 2c रखो:
(2c)² = 2c × 2c = 2 × 2 × c × c = 4c² होता है। इसलिए:
अब दोनों तरफ 2 से भाग दो:
बाईं तरफ 2 कट जाता है, और b² बचता है। दाईं तरफ 4 ÷ 2 = 2 होता है, और 2c² बचता है। इसलिए:
इसका मतलब है कि b² में भी 2 से पूरा भाग जाता है। 2 अभाज्य है, इसलिए प्रमेय 1.2 से b में भी 2 से पूरा भाग जाएगा।
स्टेप 6: अब उलटी बात को समझते हैं।
हमने शुरुआत में माना था कि √2 एक परिमेय संख्या है, और √2 = लिखा था। हमने यह भी माना था कि a और b सहअभाज्य हैं। यानी उनमें 1 के अलावा कोई साझा गुणनखंड नहीं है। लेकिन हल करने पर पता चला कि a और b, दोनों में 2 से पूरा भाग जाता है। यानी 2 उनका साझा गुणनखंड है। ये दोनों बातें एक साथ सही नहीं हो सकतीं। इसलिए शुरुआत में हमने जो माना था कि √2 परिमेय है, वह गलत है।
अतः √2 एक अपरिमेय संख्या है।
उदाहरण 5
उदाहरण 5: √3 एक अपरिमेय संख्या है।
प्रश्न क्या कह रहा है? सिद्ध करना है कि √3 को "पूर्णांक/पूर्णांक" वाली भिन्न में नहीं लिख सकते।
कौन-सा तरीका लगेगा? बिल्कुल √2 वाला तरीका, बस 2 की जगह 3 आएगा। 3 भी अभाज्य है, इसलिए प्रमेय 1.2 लगेगी।
हल:
स्टेप 1: उल्टा मान लेते हैं।
मान लेते हैं कि √3 एक परिमेय संख्या है। तब:
यहाँ a, b पूर्णांक हैं, b ≠ 0 है, और a, b सहअभाज्य हैं। सहअभाज्य इसलिए ले सकते हैं, क्योंकि भिन्न को हमेशा काटकर सबसे छोटे रूप में लिखा जा सकता है।
स्टेप 2: दोनों तरफ b से गुणा करते हैं।
दाईं तरफ ऊपर-नीचे का b कट गया, इसलिए a बचा।
स्टेप 3: दोनों तरफ का वर्ग करते हैं।
बाईं तरफ b × b = b² और √3 × √3 = 3 होता है। इसलिए:
यानी a² = 3b² है। इसलिए a² में 3 से पूरा भाग जाता है।
स्टेप 4: 3 अभाज्य है, इसलिए प्रमेय 1.2 से a में भी 3 से पूरा भाग जाएगा। तो a किसी पूर्णांक का 3 गुना है। उसका नाम c रखो:
स्टेप 5: 3b² = a² में a की जगह 3c रखते हैं।
(3c)² = 3c × 3c = 9c² होता है। इसलिए:
दोनों तरफ 3 से भाग दो:
बाईं तरफ 3 कट जाता है, और b² बचता है। दाईं तरफ 9 ÷ 3 = 3 होता है। इसलिए:
यानी b² में 3 से पूरा भाग जाता है। प्रमेय 1.2 से b में भी 3 से पूरा भाग जाएगा।
स्टेप 6: उलटी बात को समझते हैं।
शुरुआत में हमने माना था कि √3 = है। यह भी माना था कि a, b में 1 के अलावा कुछ साझा नहीं है। लेकिन हल करने पर a और b दोनों में 3 से पूरा भाग गया। यानी 3 दोनों का साझा गुणनखंड है। ये दोनों बातें एक साथ सही नहीं हो सकतीं। इसलिए √3 को परिमेय मानना गलत था।
अतः √3 एक अपरिमेय संख्या है।
अब तुम करो: √5 को अपरिमेय सिद्ध करते समय स्टेप 3 और स्टेप 5 में कौन-से समीकरण आएँगे?
उत्तर: स्टेप 3 में 5b² = a² आएगा। फिर a = 5c रखकर 5b² = 25c² आएगा, और 5 से भाग देकर b² = 5c² आएगा।
परिमेय और अपरिमेय के नियम
कक्षा IX में हमने बताया था कि: एक परिमेय संख्या और एक अपरिमेय संख्या का योग या अंतर एक अपरिमेय संख्या होती है तथा एक शून्येतर परिमेय संख्या और एक अपरिमेय संख्या का गुणनफल या भागफल एक अपरिमेय संख्या होती है।
"शून्येतर" का मतलब है "शून्य के अलावा", यानी जो संख्या 0 न हो।
आसान भाषा में:
- परिमेय + अपरिमेय = अपरिमेय। जैसे 1 + √2 अपरिमेय है।
- परिमेय − अपरिमेय = अपरिमेय। जैसे 5 − √3 अपरिमेय है, यह उदाहरण 6 में है।
- परिमेय (0 नहीं) × अपरिमेय = अपरिमेय। जैसे 3 × √2 = 3√2 अपरिमेय है, यह उदाहरण 7 में है।
- परिमेय (0 नहीं) ÷ अपरिमेय, या अपरिमेय ÷ परिमेय (0 नहीं) = अपरिमेय।
0 वाली शर्त क्यों? 0 × √2 = 0 होता है, और 0 = परिमेय है। इसलिए परिमेय संख्या 0 हो, तो गुणा का नियम नहीं चलता।
दो अपरिमेय संख्याओं पर कोई पक्का नियम नहीं है। √2 × √2 = 2 परिमेय है, पर √2 × √3 = √6 अपरिमेय है। इसलिए दो अपरिमेय संख्याओं के जोड़ या गुणा का उत्तर हर बार अलग से देखना पड़ता है।
उदाहरण 6
उदाहरण 6: दर्शाइए कि 5 − √3 एक अपरिमेय संख्या है।
प्रश्न क्या कह रहा है? 5 परिमेय है और √3 अपरिमेय है। दिखाना है कि 5 − √3 अपरिमेय है।
कौन-सा तरीका लगेगा? उल्टा मानो कि 5 − √3 परिमेय है। फिर √3 को एक तरफ अकेला करो। √3 परिमेय निकलेगा, जबकि उदाहरण 5 में हमने सिद्ध किया है कि √3 अपरिमेय है।
हल:
स्टेप 1: उल्टा मान लेते हैं।
मान लेते हैं कि 5 − √3 एक परिमेय संख्या है। तब:
यहाँ a, b सहअभाज्य पूर्णांक हैं और b ≠ 0 है।
स्टेप 2: √3 को अकेला करते हैं।
बाईं तरफ √3 के आगे ऋण है। उसे हटाने के लिए दोनों तरफ √3 जोड़ो:
बाईं तरफ −√3 और +√3 कट जाते हैं। इसलिए:
अब दाईं तरफ से हटाने के लिए दोनों तरफ से घटाओ:
स्टेप 3: बाईं तरफ को एक भिन्न बनाते हैं।
5 − में 5 के नीचे कुछ नहीं है। 5 = लिखो, ताकि दोनों के नीचे b हो:
इसलिए:
स्टेप 4: देखते हैं कि कैसी संख्या है।
a और b पूर्णांक हैं। इसलिए 5b भी पूर्णांक है, और 5b − a भी पूर्णांक है। नीचे b पूर्णांक है, और b ≠ 0 है। यानी "पूर्णांक/पूर्णांक" वाली भिन्न है, इसलिए परिमेय है। तो √3 भी परिमेय हुआ।
स्टेप 5: उलटी बात को समझते हैं।
हल करने पर पता चला कि √3 परिमेय है। लेकिन उदाहरण 5 में हम सिद्ध कर चुके हैं कि √3 अपरिमेय है। ये दोनों बातें एक साथ सही नहीं हो सकतीं। इसलिए शुरुआत में हमने जो माना था कि 5 − √3 परिमेय है, वह गलत है।
अतः 5 − √3 एक अपरिमेय संख्या है।
अब तुम करो: 2 + √2 को अपरिमेय सिद्ध करते समय √2 किसके बराबर आएगा?
उत्तर: 2 + √2 = मानो। दोनों तरफ से 2 घटाओ: √2 = − 2 = − = , जो परिमेय है।
उदाहरण 7
उदाहरण 7: दर्शाइए कि 3√2 एक अपरिमेय संख्या है।
प्रश्न क्या कह रहा है? 3√2 का मतलब 3 × √2 होता है। दिखाना है कि यह अपरिमेय है।
कौन-सा तरीका लगेगा? उल्टा मानो, फिर √2 को अकेला करो। √2 परिमेय निकलेगा, जो प्रमेय 1.3 के उलट है।
हल:
स्टेप 1: उल्टा मान लेते हैं।
मान लेते हैं कि 3√2 एक परिमेय संख्या है। तब:
यहाँ a, b सहअभाज्य पूर्णांक हैं और b ≠ 0 है।
स्टेप 2: √2 को अकेला करते हैं।
√2 के साथ 3 का गुणा है। उसे हटाने के लिए दोनों तरफ 3 से भाग दो:
बाईं तरफ 3 कट जाता है, और √2 बचता है। दाईं तरफ किसी भिन्न में 3 से भाग देने पर नीचे वाली संख्या 3 गुनी हो जाती है। जैसे ÷ 3 = होता है। इसलिए ÷ 3 = है। तो:
स्टेप 3: देखते हैं कि कैसी संख्या है।
ऊपर a पूर्णांक है। नीचे 3b भी पूर्णांक है, और शून्य नहीं है, क्योंकि b ≠ 0 है। इसलिए परिमेय है। तो √2 भी परिमेय हुआ।
स्टेप 4: उलटी बात को समझते हैं।
हल करने पर √2 परिमेय निकला। लेकिन प्रमेय 1.3 में हम सिद्ध कर चुके हैं कि √2 अपरिमेय है। ये दोनों बातें एक साथ सही नहीं हो सकतीं। इसलिए 3√2 को परिमेय मानना गलत था।
अतः 3√2 एक अपरिमेय संख्या है।
अब तुम करो: 5√3 को अपरिमेय सिद्ध करते समय √3 किसके बराबर आएगा?
उत्तर: 5√3 = मानो। दोनों तरफ 5 से भाग दो: √3 = ÷ 5 = , जो परिमेय है।
UPMSP मॉडल पेपर 2026–27 के प्रश्न
खण्ड ब, प्रश्न 1 (क), 2 अंक: दर्शाइए कि 3√2 एक अपरिमेय संख्या है।
हल: यह बिल्कुल ऊपर वाला उदाहरण 7 है। वही हल लिखो। पूरे अंक पाने के लिए ये चार बातें ज़रूर लिखो:
- "उल्टा मान लो कि 3√2 परिमेय है।"
- "3√2 = , जहाँ a, b सहअभाज्य पूर्णांक हैं और b ≠ 0 है।"
- "√2 = है, जो परिमेय है।"
- "पर √2 अपरिमेय है, इसलिए हमारा मानना गलत था।"
खण्ड अ, प्रश्न 5 (1 अंक): दिए गए कथन में कौन सा सत्य है- (A) दो अपरिमेय संख्याओं का गुणनफल सदैव अपरिमेय संख्या होती है। (B) दो परिमेय संख्याओं का योगफल सदैव परिमेय संख्या होती है। (C) दो अपरिमेय संख्याओं का योगफल सदैव अपरिमेय संख्या होती है। (D) एक परिमेय तथा एक अपरिमेय संख्याओं का योगफल सदैव परिमेय संख्या होती है।
प्रश्न क्या कह रहा है? चार बातें दी हैं। देखना है कि कौन-सी हमेशा सच है। "सदैव" का मतलब है "हमेशा"।
कौन-सा तरीका लगेगा? किसी बात को गलत दिखाने के लिए एक उल्टा उदाहरण काफी है।
हल:
स्टेप 1: (A) कहता है कि दो अपरिमेय का गुणा हमेशा अपरिमेय होता है। पर √2 × √2 = 2 है, और 2 परिमेय है। एक उदाहरण में ही बात गलत हो गई, इसलिए (A) गलत है।
स्टेप 2: (B) कहता है कि दो परिमेय का जोड़ हमेशा परिमेय होता है। यह सही है। जैसे + = + = है, जो फिर से भिन्न है। कोई भी दो भिन्नें जोड़ो, उत्तर "पूर्णांक/पूर्णांक" वाली भिन्न ही आता है।
स्टेप 3: (C) कहता है कि दो अपरिमेय का जोड़ हमेशा अपरिमेय होता है। पर √2 + (−√2) = 0 है, और 0 परिमेय है। इसलिए (C) गलत है।
स्टेप 4: (D) कहता है कि परिमेय + अपरिमेय हमेशा परिमेय होता है। पर ऊपर के नियम से परिमेय + अपरिमेय हमेशा अपरिमेय होता है, जैसे 1 + √2 अपरिमेय है। इसलिए (D) गलत है।
अतः सही विकल्प (B) है।
एक और हल किया हुआ प्रश्न (किताब से नहीं)
प्रश्न: सिद्ध कीजिए कि √7 एक अपरिमेय संख्या है।
कौन-सा तरीका लगेगा? √2 वाला तरीका। 7 भी अभाज्य है, इसलिए प्रमेय 1.2 लगेगी।
हल:
स्टेप 1: उल्टा मान लेते हैं। मान लो √7 परिमेय है। तब:
यहाँ a, b सहअभाज्य पूर्णांक हैं और b ≠ 0 है।
स्टेप 2: दोनों तरफ b से गुणा करो:
स्टेप 3: दोनों तरफ का वर्ग करो:
b × b = b² और √7 × √7 = 7 होता है। इसलिए:
यानी a² में 7 से पूरा भाग जाता है। 7 अभाज्य है, इसलिए प्रमेय 1.2 से a में भी। इसलिए a = 7c लिखो, जहाँ c एक पूर्णांक है।
स्टेप 4: 7b² = a² में a = 7c रखो:
दोनों तरफ 7 से भाग दो:
49 ÷ 7 = 7 होता है, इसलिए दाईं तरफ 7c² बचा। अब b² में 7 से भाग जाता है, और प्रमेय 1.2 से b में भी।
स्टेप 5: हमने माना था कि a और b में 1 के अलावा कुछ साझा नहीं है। लेकिन हल करने पर दोनों में 7 से पूरा भाग गया। ये दोनों बातें एक साथ सही नहीं हो सकतीं। इसलिए √7 को परिमेय मानना गलत था।
अतः √7 एक अपरिमेय संख्या है।
खुद करके देखो (किताब से नहीं)
पहले खुद हल करो, फिर नीचे दिए हल से मिलाओ।
स्तर 1: शुरुआत
- इनमें से कौन-सी संख्याएँ अपरिमेय हैं: √9, √5, 0, 2 + √3
स्तर 2: अभ्यास
- दर्शाइए कि 7 − √2 एक अपरिमेय संख्या है।
स्तर 3: परीक्षा अभ्यास (परीक्षा जैसे प्रश्न, पुराने प्रश्न पत्र से नहीं)
- सिद्ध कीजिए कि √5 एक अपरिमेय संख्या है।
सारे प्रश्नों के हल
प्रश्न 1: अपरिमेय संख्याएँ छाँटो
हल:
स्टेप 1: 3 × 3 = 9 है, इसलिए √9 = 3 = है। यह परिमेय है।
स्टेप 2: 2 × 2 = 4 और 3 × 3 = 9 है। बीच में कोई पूर्ण संख्या नहीं, जिसका वर्ग 5 हो। √5 का वर्गमूल पूरा नहीं निकलता, और √5 अपरिमेय है।
स्टेप 3: 0 = है, इसलिए 0 परिमेय है।
स्टेप 4: 2 परिमेय है और √3 अपरिमेय है। परिमेय + अपरिमेय = अपरिमेय, इसलिए 2 + √3 अपरिमेय है।
अंतिम उत्तर: अपरिमेय संख्याएँ √5 और 2 + √3 हैं।
प्रश्न 2: 7 − √2 अपरिमेय है
हल:
स्टेप 1: उल्टा मान लो कि 7 − √2 परिमेय है। तब:
यहाँ a, b सहअभाज्य पूर्णांक हैं और b ≠ 0 है।
स्टेप 2: √2 को अकेला करो। दोनों तरफ √2 जोड़ो:
अब दोनों तरफ से घटाओ:
स्टेप 3: 7 = लिखो, ताकि दोनों के नीचे b हो:
स्टेप 4: 7b − a और b दोनों पूर्णांक हैं, और b ≠ 0 है। इसलिए परिमेय है, यानी √2 परिमेय हुआ।
स्टेप 5: लेकिन प्रमेय 1.3 से √2 अपरिमेय है। ये दोनों बातें एक साथ सही नहीं हो सकतीं। इसलिए 7 − √2 को परिमेय मानना गलत था।
अंतिम उत्तर: 7 − √2 एक अपरिमेय संख्या है।
प्रश्न 3: √5 अपरिमेय है
हल:
स्टेप 1: उल्टा मान लो कि √5 परिमेय है। तब:
यहाँ a, b सहअभाज्य पूर्णांक हैं और b ≠ 0 है।
स्टेप 2: दोनों तरफ b से गुणा करो:
स्टेप 3: दोनों तरफ का वर्ग करो:
क्योंकि b × b = b² और √5 × √5 = 5 होता है। यानी a² में 5 से भाग जाता है। 5 अभाज्य है, इसलिए प्रमेय 1.2 से a में भी। इसलिए a = 5c लिखो।
स्टेप 4: a = 5c रखो:
दोनों तरफ 5 से भाग दो:
25 ÷ 5 = 5 होता है। अब b² में 5 से भाग जाता है, और प्रमेय 1.2 से b में भी।
स्टेप 5: a और b में 1 के अलावा कुछ साझा नहीं माना था। पर हल करने पर दोनों में 5 से भाग गया। ये दोनों बातें एक साथ सही नहीं हो सकतीं, इसलिए √5 को परिमेय मानना गलत था।
अंतिम उत्तर: √5 एक अपरिमेय संख्या है।
जल्दी दोहराओ
- अपरिमेय संख्या = जिसे "पूर्णांक/पूर्णांक" वाली भिन्न में न लिख सकें।
- उल्टा मानकर सिद्ध करना: उल्टी बात मानो, आगे बढ़ो, उलटी बात निकलेगी, इसलिए माना हुआ गलत था।
- प्रमेय 1.2: अभाज्य p से a² में भाग जाए, तो a में भी जाएगा। (इसकी उपपत्ति परीक्षा में नहीं है।)
- p का अभाज्य होना ज़रूरी है: 4 से 36 में भाग जाता है, पर 6 में नहीं।
- √2, √3 की उपपत्ति: √2 = (सहअभाज्य) → वर्ग करो → a और b दोनों में 2 से भाग → उलटी बात।
- 5 − √3, 3√2 जैसी संख्याएँ: √ वाली संख्या अकेली करो → वह परिमेय निकलती है → उलटी बात।
- परिमेय (0 नहीं) × अपरिमेय = अपरिमेय। 0 × √2 = 0 परिमेय है, इसलिए 0 वाली शर्त ज़रूरी है।
- मॉडल पेपर 2026–27 में 3√2 वाला प्रश्न 2 अंक का था।